विरुद्ध थी। जिस कारण से कोई लाभ होना ही नहीं था। हमारा क्या दोष है? जो गुरु जी ने साधना बताई मैं तो तन- मन -धन से कर रही थी। अब पता चला कि वे गुरु नहीं है, वे तो Quack नीम हकीम हैं।The biggest enemies of human life are. मानव जीवन के सबसे बड़े शत्रु हैं। यदि मुझे यह सत्य साधना मिल जाती तो मेरा पुत्र नहीं मरता।Because क्योंकि मैंने आपके सेवकों के सुखों को देखा है तथा उन पर आने वाली भयंकर आपत्तियों को टालते देखा है। तब मैं आपका सत्यम सुनने आई हूं तथा आपका लगातार चार दिन तक सत्संग सुनकर आज उपदेश लेने की Wish I had इच्छा हुई है। मैंने उस बहन से कहा कि जिन Practices साधनाओं को आप कर रही थी वे शास्त्र विधि अनुसार नहीं थी, जिस कारण आपको परमेश्वर से लाभ प्राप्त नहीं हुआ। यह तो आपने स्वयं ही निर्णय लेकर बता दिया। Because क्योंकि आज तक आपको सत्संग ही प्राप्त नहीं हुआ था। जिसे आप सत्संग जानकर श्रवण करती थी, वह सत्संग नहीं लोक वेद (Suna told scripture versus knowledge). (सुना सुनाया शास्त्र विरुद्ध ज्ञान ) था। जो आप किसी धाम पर जाती थी तथा पाठ करवाती थी। आदरणीय गरीबदास जी की पूजा करती थी। जब कि आदरणीय गरीबदास जी तो कहते हैं कि :-
पूजें देई धाम को, शीश हलावें जो। गरीबदास साची कहैं, हद काफिर हैं सो।
उपरोक्त अमृतवाणी में प्रमाण है कि आदरणीय Garib Das Saheb Ji is saying. गरीबदास साहेब जी कह रहे हैं कि मेरा उद्धार भी परमेश्वर कबीर KavirDev (कबीर्देव) ने किया तथा तुम भी उसी सर्वशक्तिमान (कवीरमितौजा) अनन्त शक्तियुक्त कबीर परमेश्वर की ही भक्ति करो। Devotee God Kabir only with strength.
{वेदों में कबीर परमेश्वर जी को "कविरमितौजा" लिखा है जिसका अर्थ है Kabirdev is eternal power. कबीर्देव अनन्त शक्तिमान है। संस्कृत भाषा के जानकार अपनी किताबी बुद्धि के अनुसार "कविरमितौजा" का अर्थ करते हैं कि कवि अनन्त शक्तिमान है। उसकी शक्ति का कोई वार-पार नहीं है। idea विचार करने की बात है कि कोई भी कवि अनन्त शक्तिमान नहीं हो सकता। वेदों केे गूढ़ शब्दों को ठीक से न समझकर वेदों के अनुवादककों ने अर्थ ठीक नहीं किए हैं। वेदों में अनेकों स्थानों पर परमात्मा की महिमा की है वहाॅं पर "कविर्देव" लिखा है जिसका अर्थ अनुवादकों ने "कवि परमेश्वर" किया जबकि उसका अर्थ "कवीर् परमेश्वर" बनता है। हम उसे कबीर (कबिर) साहेब कहते हैं। We call him Kabir (Kabir) Saheb. उन्हीं अनुवादकों ने यजुर्वेद में यजु: (हजुर्) का यजुर्वेद किया है क्योंकि उसमें प्रकरण यजुर्वेद का है और केवल "यजु:" शब्द लिखा है। इसी प्रकार प्रकरणवश कहीं पर "कवि:" भी वेदों में लिखा है और महिमा परमात्मा की कही तो वहाॅं पर "कविर्देव" लिखकर अनुवाद करना उचित है।
उदाहरण के लिए यजुर्वेद अध्याय 5 श्लोक 32 में लिखा है :-
"उशिक् असी कविरंघारि असी बंभारी असी सम्राट असि स्वर्ज्योति ऋतधामा असि" जिसका अर्थ अनुवाद इस प्रकार है :-
(उशिक असि) जो परम शांति दायक है, वह (कविर अंघ करि) कविर्देव है जो पापों का शत्रु यानी पाप नाशक (असि) है। (बंभारि) बंधनों का शत्रु यानी बंधन का नाश करने वाला बन्दी छोड़ (असि) है। (सम्राट असि) सर्व ब्रह्माण्डो का महाराज मालिक Owner है। वह सोया (स्वर्ज्योति) स्वप्रकाशित (ऋतधामा) सतलोक Satlok में रहने वाला (असि) है जबकि अन्य अनुवादकों ने इस वेद के मंत्र के अनुवाद में "कविर" का अर्थ सर्वज्ञ किया है जो अनर्थ है। कवि कोई सर्वज्ञ नहीं हो सकता। A poet cannot be omniscient. महिमा परमात्मा की है। मूल पाठ से स्पष्ट है कि "कविर" यानी कविर्देव "अंघ अरि" यानी पापों का शत्रु है। शब्द लिखा है कविरंघारि यानी कविर्देव की महिमा है, वह पाप नाशक प्रभु है। He is the destroyer of sin.}..................................................page-13...... उसके लिए कहा है कि पूर्ण संत जो कबीर परमेश्वर (कविर्देव) का कृपा पात्र हो, उससे उपदेश लेकर अपना कल्याण करवाओ। झूठे गुरुओं के आश्रित रहने से जीवन व्यर्थ होता है। उस शास्त्र विरुद्ध साधना बताने वाले नकली गुरु को त्याग देना चाहियें। उसके तो दर्शन भी अशुभ होते हैं। आदरणीय गरीबदास की अपनी अमृतवाणी में कहते हैं कि:-
झूठे गुरु को लीतर लावैं, उसको निश्चय पीटे। उसके पीटे पाप नहीं है, घर से काढ़ घसीटे।।
उपरोक्त अमृतवाणी में आदरणीय गरीब दास साहेब जी शास्त्र विधि रहित साधना बताकर अनमोल मानव जन्म को नष्ट करने वाले नकली (झूठे) मार्ग दर्शकों (गुरुओं) के विषय में कह रहे हैं कि आप का जीवन नष्ट करने वाले हैं। उनसे तुरंत छुटकारा लेना चाहिये।घर में घुसने नहीं देना चाहिए। वे तो परमेश्वर कबीर (कविर्देव) के द्रोही है तथा काल के भेजे दूत हैं।
नोट:- आज वर्तमान में पूर्ण संत हैं तो वह संत रामपाल जी महाराज है जिनको नाम दीक्षा देने का अधिकार है संत रामपाल जी महाराज जी से नाम उपदेश लेकर अपना मानव जीवन सफल बनाए।


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