अन्य प्रमाण :- श्री देवी महापुराण के तीसरे स्कंध के अध्याय 4 -5 पृष्ठ 138 की संबंधित प्रकरण की फोटो कॉपी :-
१३८ * संक्षिप्त देवीभागवत* [तीसरा स्कंध
सूर्य जगत् को प्रकाशित करता है तुम शुद्ध स्वरूपा हो, यह सारा संसार तुम्हीं से उद्भासित हो रहा है। मैं, ब्रह्मा और शंकर___ हम सभी तुम्हारी कृपा से ही विद्यमान है हमारा आविर्भाव और तिरोभाव हुआ करता है। केवल तुम्हीं नित्य हो, जगज्जननी हो, प्रकृति और सनातनी देवी हो।
भगवान् शंकर बोले--' देवी! यदि महा भाग विष्णु तुम्हीं से प्रकट हुए हैं तो उनके बाद उत्पन्न होने वाले ब्रह्मा भी तुम्हारे ही बालक हुए। फिर मैं तमोगुणी लीला करने वाला शंकर क्या तुम्हारी संतान नहीं हुआ --अर्थात् मुझे भी उत्पन्न करने वाली तुम्हीं हो। शिवे! संपूर्ण संसार की सृष्टि करने में तुम बड़ चतुर हो।
यह फोटोकॉपी श्री देवी पुराण की है। इसमें श्री विष्णु जी स्वयं स्वीकार कर रहे हैं कि मेरा (विष्णु का) श्री ब्रह्मा का तथा श्री शिव का आविर्भाव यानी जन्म तथा तिरोभाव यानी मरण होता है। इसी फोटोकॉपी में यह भी प्रमाणित है कि इन तीनों को जन्म देने वाली भी देवी दुर्गा जी यानी अष्टांगी है। हिंदू धर्म के अज्ञानी धर्मगुरु कहते हैं कि इनके कोई माता-पिता नहीं है। इस प्रकार की अनेक मिथ्या कथाऐ शास्त्रों के विपरीत बताकर इन ज्ञानियों ने हिंदू समाज का बेड़ा गर्क कर रखा है
हिंदू धर्म गुरु कहते हैं कि श्री विष्णु जी सतगुण, श्री शिवजी तमगुण व अन्य देवी- देवताओं की पूजा करो जबकि गीता में अध्याय 7 के श्लोक 12-15 तथा 20 -23 में कहा है कि इनकी पूजा करने वाले राक्षस और स्वभाव को धारण किए हुए, मनुष्यों में नीच दूषित कर्म करने वाले मूर्ख
हैं।
हिंदू धर्म गुरु श्री ब्रह्मा, श्री विष्णु पिता श्री शिव जी को ईश यानी सर्व के स्वामी बताते हैं जबकि श्री शिव महापुराण भाग 1 में विधेश्वर संहिता पृष्ठ 17 -18 अध्याय 9- 10 में स्पष्ट है कि सदा शिव यानी काल ब्रह्म श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी के पिता जी हैं जो गीता अध्याय 11 के श्लोक 32 में कह रहा है कि मैं काल हूं। उसने विधेश्वर संहिता भाग -1 के प्रश्न 17 पर आपस से में लड़ रहे श्री ब्रह्मा जी तथा श्री विष्णु जी के मध्य में तेजो में स्तंभ खड़ा करके उनका युद्ध बंद करवा कर कहा कि तुम अपने को संसार का ईश यानी स्वामी कह रहे हो, इस बात पर लड़ रहे हो। तुम ईश (प्रभु =भगवान) नहीं हो। यह सब मेरा है। मेरा एक ॐ (ओम्) मंत्र, भक्ति का है जो 5 अवयवों से एकीभूत होकर यानि अ,उ,म,नाद तथा बिंदु से मिलकर एक ॐ (ओम्) अक्षर बना है। गीता अध्याय 8 श्लोक 13 में भी इसी ने श्री कृष्ण में प्रवेश करके गीता का ज्ञान का था। उसमें कहा है कि मुझे ब्रह्म का केवल एक ओम (ॐ) अक्षर है उच्चारण करके स्मरण करने का।
श्री शिव पुराण का प्रकरण बताता हूं :- शिवपुराण के विधेश्वर संहिता भाग- 1 पर........


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