Of dignity geeta/गरिमा गीता की - दो शब्द
Pege-10
" काल की परिभाषा "
पवित्र विष्णु पुराण (प्रथम अंश) अध्याय 2 श्लोक 15 में वर्णन है कि भगवान विष्णु (महा विष्णु रूप में काल) का प्रथम रूप तो पुरुष (प्रभु जैसा) है परंतु उसका परम रूप 'काल' है। But its ultimate form is 'Kaal' जब भगवान विष्णु (काल जो महा विष्णु रूप में ब्रह्मलोक Brahmlok में रहता है तथा प्रकृति अर्थात् दुर्गा को अपनी पत्नी महालक्ष्मी रूप में रखता है That is, Durga is kept as his wife Mahalakshmi.) अपनी प्रकृति (दुर्गा) से अलग हो जाता है तो काल रूप में प्रगट हो जाता है। (यह प्रकरण विष्णु पुराण प्रथम अंश अध्याय 2 पृष्ठ 4-5 गीता प्रैस गोरखपुर से प्रकाशित है। अनुवादक हैं श्री मुनीलाल गुप्त।)
विशेष :-उपरोक्त विवरण का भावार्थ है कि यह महाविष्णु अर्थात् काल पुरुष प्रथम दृष्टा रूप तो लगता है कि यह दयावान भगवान है। That it is a merciful God. जैसे खाने के लिए अन्न Grain , मेवा व फल Nuts and fruits आदि कितने स्वादिष्ट प्रदान किए हैं तथा पीने के लिए दूध milk, जल water कितने स्वादिष्ट तथा प्राण दायक प्रदान किए हैं। कितनी अच्छी वायु जीने के लिए चला रखी है, How well the air has run to live, कितनी विस्तृत पृथ्वी रहने तथा घूमने के लिए प्रदान की है, फिर पति- पत्नी का योग, पुत्रों और पुत्रियों की प्राप्ति से लगता है यह तो बड़ा दयावान प्रभु है जिसके लोक में हम रह रहे हैं। That this is a very merciful God in whose world we are living.
महा विष्णु का वास्तविक रूप काल कैसे हैं :-How is Kaal the real form of Maha Vishnu: - किसी के पुत्र की मृत्यु, किसी की पुत्री की मृत्यु, किसी के दोनों पुत्रों की मृत्यु, किसी का पूरा परिवार दुर्घटना में मृत्यु The death को प्राप्त हो जाता है। किसी क्षेत्र में बाढ़ आकर हजारों व्यक्तियों की परिवार सहित मृत्यु, किसी क्षेत्र में भूकंप से लाखों व्यक्ति सपरिवार मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। क्योंकि ज्योति निरंजन (काल ब्रह्म) शाप वश 100000 एक लाख one lakh मानव शरीर धारी प्राणियों का आहार करता है। इसलिए इसने अपने तीनों पुत्रों (रजोगुण ब्रह्मा जी, सतोगुण विष्णु जी तथा तमोगुण शिवजी)} से उत्पत्ति Origin, स्थिति Event व संहार Destruct करवाता है।
उदाहरण :- अपने प्रिय सेवक श्री धर्मदास जी द्वारा काल की स्थिति पूछने पर पूर्ण ब्रह्म कविर्देव Full brahma kabirdev ने बताया कि जैसे कसाई बकरे पालता है। उन प्राणियों के चारे की व्यवस्था करता है, पानी का प्रबंध करता है ,गर्मी व सर्दी से बचने के लिए कुछ मकान आदि का भी प्रबंध करता है, जिससे वह अबोध बकरे समझते हैं कि हमारा स्वामी बहुत नेक है। हमारा कितना ध्यान रखता है। जब कसाई उनके पास आता है तो वह नर व मादा बकरे उसे अपना सुखदाई मालिक जानकर उसको प्यार जताने के लिए आगे वाले पैर उठाकर कसाई के शरीर को स्पर्श करते हैं, कुछ उसके पैरों को चाटते हैं। कुछ को वह स्वयं छूकर कमर पर हाथ लगाकर दबा दबा कर देखता है तो वे बकरे समझते हैं कि हमें प्यार दे रहा है। परंतु कसाई देख रहा होता है कि इस बकरे में कितने किलोग्राम मास हो चुका है। जब मास लेने के लिए ग्राहक आता है तो उस समय कसाई नहीं देखता कि किसका बाप मर रहा है, किसकी बेटी या पुत्र या सर्व परिवार मर रहा है। उनको सुविधा देने का उसका यही उद्देश्य था। ठीक इसी प्रकार सर्व प्राणी काल (ब्रह्म) साधना करके काल आहार ही बने हैं। इससे छूटने की विधि आपको इसी पुस्तक में विस्तृत मिलेगी। एक बहन ने मुझ दास का सत्संग सुना तथा बाद में अपनी दु:ख भरी कथा The story सुनाई जो निम्न है :-
प्रत्यक्ष प्रमाण :- उस बहन ने कहा महाराज जी में विधवा हूॅं। एक पुत्र की प्राप्ति होते.......... ही मेरे पति की मृत्यु हो गई।
See more . Mangal discourse of the metaphysician Saint Rampal Ji Maharaj. 8:30 to 9:30 pm on Shadhna Channel📺. And 7:30 to 8:30 pm on Ishwar Channel 4.
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1 टिप्पणियाँ
Sat saheb ji
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