श्री कृष्ण जी नेक आत्मा तथा युद्ध विरोधी थे
कालयवन का वध कैसे हुआ और किसने किया
सभ्य लोगों के चरित्र में ढूंढने से भी नहीं मिलता है। तब वे अज्ञानी गुरु जी (नीम-हकीम) कहा करते थे कि अर्जुन क्षत्री धर्म को त्याग रहा था। इससे क्षत्रित्व को हानि तथा शूरवीरता Bravery का सदा के लिए विनाश हो जाता। अर्जुन को क्षत्री धर्म पालन करवाने के लिए यह महाभारत का युद्ध श्री कृष्ण जी ने करवाया था।
विश्लेषण :- भगवान श्री कृष्ण जी स्वयं क्षत्री Kshatri थे। कंस के वध के उपरान्त श्री अग्रसैन जी ने मथुरा की बाग-डोर अपने दोहते श्री कृष्ण जी को संभलवा दी थी। एक 1 दिन नारद जी Narada ji ने श्री कृष्ण जी को बताया कि निकट ही एक गुफा में एक सिद्धि युक्त राक्षस राजा मुचकन्द Demon king mukchanda सोया पड़ा है। वह 6 छ: महीने सोता है तथा 6 छ: महीने जागता है। जागने पर 6 छ: महीने युद्ध करता रहता है तथा 6 छ: महीने शयन के समय यदि कोई उसकी निंद्रा भंग कर दे तो मुचकन्द की आंखों से अग्नि बाण Fire arrow छूटते हैं तथा सामने वाला तुरंत मृत्यु को प्राप्त हो जाता है, आप सावधान रहना। यह कह कर श्री नारद जी चले गए gone।
कुछ समय उपरांत श्री कृष्ण जी को छोटी उम्र में मथुरा के सिंहासन पर बैठा देखकर कालयवन नामक राजा ने अपने दामाद कंस की हत्या का प्रतिशोध लेने के लिए अठारह 18 करोड़ सेना लेकर मथुरा पर आक्रमण कर दिया। श्री कृष्ण जी ने देखा कि दुश्मन की सैना बहु संख्या में है तथा न जाने कितने सैनिक मृत्यु को प्राप्त होंगे, क्यों न कालयवन का वध मुचकन्द Slaughter of Kalayavan from Mukkand से करवा दूॅं। भगवान श्री कृष्ण जी ने कालयवन को युद्ध के लिए ललकारा तथा युद्ध छोड़ कर (क्षत्री धर्म को भूल कर विनाश टालना आवश्यक जानकर) भाग लिये और उस गुफा में प्रवेश किया जिसमें मुचकन्द सोया हुआ था। मुचकन्द के शरीर पर अपना पीतांबर (पीली चद्दर) डालकर श्री कृष्ण जी गुफा में गहरे जाकर छुप गए। पीछे- पीछे कालयवन भी उसी गुफा में प्रवेश कर गया। कालयवन ने मुचकन्द को श्री कृष्ण समझ कर उसका पैर पकड़कर घुमा दिया तथा कहा कि कायर तुझे छुपे हुए को थोड़े ही छोडूंगा। पीड़ा के कारण मुचकन्द की निंद्रा भंग Sleep disturbance हुई , नेत्रों से अग्नि बाण Fire out of the eyes निकलें तथा कालयवन का वध हुआ। कालयवन के सैनिक तथा मंत्री अपने राजा के सब को लेकर वापस चल पड़े। क्योंकि युद्ध में राजा की मृत्यु सैना की हार मानी जाती थी। जाते हुए कह गए कि हम नया राजा नियुक्त करके शीघ्र ही आयेंगे तथा श्री कृष्ण तुझे नहीं छोड़ेंगे।
श्री कृष्ण जी ने अपने मुख्य अभियन्ता (चीफ इंजीनियर Chief engineer ) श्री विश्वकर्मा जी Mr. Vishwakarma को बुलाकर कहा कि कोई ऐसा स्थान खोजो, जिसके तीन तरफ समुद्र हो तथा एक ही रास्ता (द्वार) हो। वहां पर अति शीघ्र एक द्वारिका Dwarka city (एक द्वार वाली) नगरी बना दो। हम शीघ्र ही यहां से प्रस्थान करेंगे। यह मूर्ख लोग यहां चैन से नहीं जीने देंगे। श्री कृष्ण जी इतने नेक आत्मा तथा युद्ध विरोधी थे कि अपने क्षत्रीत्व को भी दाव पर रखकर जुल्म को टाला। क्या फिर वही श्री कृष्ण जी अपने प्यारे साथी व बहनोई को ऐसी गलत राय दे सकते हैं? स्वयं युद्ध ने करने का वचन करने वाले दूसरे को युद्ध की प्रेरणा दे सकते हैं? अर्थात कभी नहीं। गीता अध्याय 18 के श्लोक 43 में गीता ज्ञान दाता ने क्षत्री के स्वाभाविक कर्मों का उल्लेख करते हुए कहा है कि "युद्ध से न भागना" आदि -आदि क्षत्री के स्वभाविक कर्म है। इस से भी सिद्ध हुआ कि गीता जी का ज्ञान श्री कृष्ण जी ने नहीं बोला। क्योंकि श्री कृष्ण जी स्वयं क्षत्री होते हुए कालयवन के सामने से युद्ध से भाग कर गए थे। व्यक्ति स्वयं किए कर्म के विपरीत अन्य को राय नहीं देता। न उसकी राय श्रोता को ठीक जांचेगी । वह उपहास का पात्र बनेगा। यह गीता ज्ञान ब्रह्म (काल) ने प्रेतवत्..........





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