Of dignity geeta/गरिमा गीता की - दो शब्द
Pege-7
वैशम्पायनजी कहते हैं --अर्जुन के ऐसा कहने पर वक्ताओं में श्रेष्ठ महा तेजस्वी भगवान् श्री कृष्ण ने उन्हें गले से लगाकर इस प्रकार उत्तर दिया।
श्री कृष्ण बोले - अर्जुन! उस समय मैंने तुम्हें अत्यंत गोपनीय विषयका श्रवण कराया था, अपने स्वरूपभूत धर्म सनातन पुरुषोत्तमतत्त्वका परिचय दिया था और (शुक्ल - कृष्ण गति का निरूपण करते हुए) नित्य लोगों का भी वर्णन किया था। किंतु तुमने जो अपनी नासमझीके कारण उसे उपदेश को याद नहीं रक्खा यह जानकर मुझे बड़ा खेद हुआ है। उन बातों का अब पूरा पूरा स्मरण होना संभव नहीं जान पड़ता। पांडू नंदन ! निश्चय ही तुम बड़े श्रद्धा हिन हो, तुम्हारी बुद्धि अच्छी नहीं जान पड़ती। अब मेरे लिए उस उपदेश को ज्यों का त्यों दुहरा देना कठिन है, क्योंकि उस समय योग युक्त होकर मैंने परमातत्त्वका का वर्णन किया था। (अधिक जानकारी के लिए पढ़ें- 'संक्षिप्त महाभारत द्वितीय भाग')
विचार करें :- उपरोक्त्त विवरण से सिद्ध हुआ कि श्री कृष्ण जी ने श्रीमद्भागवत गीता जी का ज्ञान नहीं बोला, यह तो काल (ज्योति निरंजन अर्थात् ब्रह्म) ने बोला था।
💠 श्री कृष्ण जी ने अर्जुन को अपने स्तर की गीता सुनाई जो महाभारत ग्रंथ में इस प्रकरण के तुरंत पश्चात् यानि लगातार लिखी है जो श्री कृष्ण जी ने अपने ज्ञान स्तर की गीता की कही है जो एक ऋषि की कहानी है जिसमें जरा भी अध्यात्मिक ज्ञान इस श्रीमद्भागवत से मेल नहीं करता।
आश्चर्य की बात तो यह है कि वही गीता जो महाभारत के युद्ध के पूर्व काल ब्रह्म ने श्रीकृष्ण में प्रवेश करके बोली थी, श्री वेद व्यास ऋषि ने बर्षो उपरान्त शब्दाशब्द लिखी जो सात सौ (700) श्लोकों में अपने को उपलब्ध है। श्री कृष्ण जी को याद नहीं थी क्योंकि उनको पता ही नहीं कि क्या बोला था। काल ने वेदव्यास जी की दिव्य दृष्टि खोल दी जिस कारण से वेदव्यास जी ने गीता लिखी थी।
अन्य प्रमाण :- (1) कुछ समय उपरांत श्री युधिष्ठिर जी को भयंकर स्वपन आने लगे। श्री कृष्ण जी से कारण तथा समाधान पूछा तो बताया कि तुमने युद्ध में जो पाप किए हैं वह नरसंहार का दोष तुम्हें दु:ख दाई हो रहा है। इसके लिए एक यज्ञ करो। श्री कृष्ण जी के मुख कमल से यह वचन सुनकर श्री अर्जुन को बहुत दु:ख हुआ तथा मन ही मन विचार करने लगा कि भगवान श्री कृष्ण जी पवित्र गीता बोलते समय तो कह रहे थे कि अर्जुन तुम्हें कोई पाप नहीं लगेगा, तूं युद्ध कर ले (पवित्र गीता अध्याय 2 के श्लोक 37-38)। यदि युद्ध में मारा भी गया तो स्वर्ग को स्वर्ग का सुख भोगेगा, अन्यथा युद्ध में जीतकर पृथ्वी के राज्य का आनन्द लेगा। अर्जुन ने विचार किया कि जो समाधान दु:ख निवारण का श्री कृष्ण जी बताया है इसमें करोड़ों..... रुपए व्यय होने है
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