Of dignity geeta/गरिमा गीता की - दो शब्द
Pege-8
रुपए व्यय होने हैं। जिससे बड़े भाई युधिष्ठिर का कष्ट निवारण हुआ। यदि मैं श्री कृष्ण जी से वाद-विवाद करूंगा कि आप पवित्र गीता जी का ज्ञान देते समय तो कह रहे थे कि तुम्हें पाप नहीं No sin लगेगा। अब उसके विपरीत कह रहे हो। इससे मेरा बड़ा भाई यह न सोच बैठे कि करोड़ों रुपए के खर्च को देखकर अर्जुन बौखला गया है तथा मेरे कष्ट निवारण से प्रसन्न नहीं है। इसलिए मौन रहना उचित जानकर सहर्ष स्वीकृति Acceptance दे दी कि जैसा आप कहोगे वैसा ही होगा। श्री कृष्ण जी ने उस यज्ञ की तिथि निर्धारित कर दी। वह यज्ञ श्री सुदर्शन सपूच Sudarshan Sapuch के भोजन खाने से सफल हुई। (यज्ञ का प्रकरण देखें इसी पुस्तक के पृष्ठ नंबर 264 पर।)
कुछ समय उपरान्त ऋषि दुर्वासा जी के शापवश सर्व यादव कुल विनाश Destruction हो गया, श्री कृष्ण भगवान के पैर के तलुवे में एक शिकारी (जो त्रेता युग में सुग्रीव के भाई बाली की ही आत्मा थी) ने विषाक्त तीर Toxic arrow मार दिया। तब पाॅंचों पांडवों के घटना स्थल पर पहुंच जाने के उपरान्त श्री कृष्ण जी ने कहा कि आप मेरे शिष्य हो मैं आपका धार्मिक गुरु भी हूॅं। इसलिए मेरी अंतिम आज्ञा Final order सुनो। एक तो यह है कि अर्जुन, द्वारिका की सर्व स्त्रियों को इंद्रप्रस्थ (दिल्ली) ले जाना, क्योंकि यहां कोई नर नहीं बचा है तथा दूसरे आप सर्व पाण्डव राज्य त्याग Renunciation of state कर हिमालय में साधना करके शरीर को गला throat देना। क्योंकि तुमने महाभारत के युद्ध के दौरान जो हत्याऐं The murders की थी, तुम्हारे शीश पर वह पाप बहुत भयंकर है। That sin is very terrible on your head. उस समय अर्जुन अपने आप को नहीं रोक सका तथा कहा प्रभु वैसे तो आप ऐसी स्थिति में है कि मुझे ऐसी बातें नहीं करनी चाहिऐं, परंतु प्रभु यदि आज मेरी शंका का समाधान नहीं हुआ तो मैं चैन से मर भी नहीं पाऊॅंगा। पूरा जीवन रोता रहूॅंगा। श्री कृष्ण जी ने कहा अर्जुन पूछ ले जो कुछ पूछना है, मेरी अंतिम घड़ियाॅं है। My last watches श्री अर्जुन ने आंखों में आंसू भर कर कहा कि प्रभु बुरा न मानना। जब आपने पवित्र गीता जी का ज्ञान कहा था उस समय मैं युद्ध करने से मना कर रहा था। आपने कहा था कि अर्जुन तेरे दोनों हाथों में लड्डू है। यदि युद्ध में मारा गया तो स्वर्ग को प्राप्त होगा और यदि विजयी हुआ तो पृथ्वी का राज्य भोगेगा तथा तुम्हें कोई पाप नहीं लगेगा। हमने आप ही की देख-रेख व आज्ञा अनुसार युद्ध किया (श्रीमान पवित्र गीता अध्याय 2 के श्लोक 37-38)। हे भगवान! हमारे तो एक हाथ में भी लड्डू नहीं रहा। ने तो युद्ध में मरकर स्वर्ग प्राप्ति हुई तथा अब राज्य त्यागने का आदेश आप दे रहे हैं, ने ही पृथ्वी के राज्य का आनंद ही भोग पाए। ऐसा छल युक्त व्यवहार करने में आपका क्या हित था? अर्जुन के मुख से यह वचन सुनकर युधिष्ठिर जी ने कहा कि अर्जुन ऐसी स्थिति में जबकि भगवान अंतिम श्वास गिन रहे हैं आपका शिष्टाचार रहित व्यवहार शोभा नहीं देता। श्री कृष्ण जी ने कहा अर्जुन आज मैं अंतिम स्थिति में हूॅं, तुम मेरे अत्यंत प्रिय हो, आज वास्तविकता बताता हूॅं That there is some villain-like and power who kept dancing like a yantra, I do not know what I said in the Gita. कि कोई खलनायक जैसी और सक्ति है जो अपने को यंत्र की तरह नचाती रही, मुझे कुछ मालूम नहीं मैंने गीता में क्या बोला था। परंतु अब मैं जो कह रहा हूॅं वह तुम्हारे हित में है। श्री कृष्ण जी यह वचन अश्रु युक्त नेत्रों से कह कर प्राण त्याग गए। उपरोक्त विवरण से सिद्ध हुआ कि पवित्र गीता जी का ज्ञान श्री कृष्ण जी ने नहीं कहा। यह तो ब्रह्म (ज्योति निरंजन -काल) ने बोला है, जो 21 ब्रह्मांड का स्वामी है। काल (ब्रह्म) कौन है? यह जानने के लिए सृष्टि रचना पढ़ें।
श्री कृष्ण सहित सर्व यादवों का अंतिम संस्कार कर अर्जुन को छोड़कर चारों भाई इंद्रप्रस्थ (दिल्ली) चले गए। पीछे से अर्जुन द्वारिका की स्त्रियों को लिए आ रहा था। रास्ते में जंगली लोगों ने सर्व गोपियों को लूटा तथा कुछेक को भगा ले गए तथा अर्जुन को पकड़कर .........पीटा।
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