Of dignity geeta/गरिमा गीता की - विषयानुक्रमणिका - भुमिका-A
🔑भुमिका⚖️
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इस पुस्तक में श्रीमद भगवत गीता के संपूर्ण ज्ञान का अर्थ प्रकाश किया गया है जो गीता से 18 अध्यायों के 700 श्लोकों का हिंदी सारांश है। ऐसा आज तक किसी हिंदू धर्म के गुरु ने तथा गीता के अनुवाद करता ने नहीं किया। सबने भोले हिंदू समाज को भ्रमित करके उल्टा पाठ पढ़ाया है। मेरा मानव समाज से निवेदन है कि इन झूठे गुरुओं की मेरे साथ आध्यात्मिक ज्ञान चर्चा करवाएं। तथा पता चलेगा ज्ञानी और अज्ञानी का। इस पुस्तक को ध्यान पूर्वक दिल थमा कर पढ़ें। आप स्वयं समझ जाओगे कि मजारा क्या है? इसी पुस्तक में लिखी सृष्टि रचना sarshti Rachana में तथा गीता के सारांश में आप जी को श्री ब्रह्मा, विष्णु, महेश जी के माता-पिता तथा देवी दुर्गा के पति कौन है? आदि का ज्ञान भी होगा जिससे आज तक अपने धर्म गुरु नहीं बता पाए जो अपने ही ग्रंथों में लिखे हैं।
श्रीमद भगवत गीता चारों वेदों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद) का संक्षिप्त रूप है। दूसरों शब्दों में गागर में सागर है। चारों वेदों में अठारह हजार 18000 श्लोक (मंत्र) हैं। उनको गीता में 574 श्लोकों में लिखा है। जिस कारण से गीता में सांकेतिक शब्द अधिक है। वैसे तो गीता में 700 श्लोक हैं। जिनमें 574 काल ब्रह्म kal brahamने श्रीकृष्ण के मुख से गए हैं, शेष श्लोक संजय तथा अर्जुन के कहें हैं जो ज्ञान से संबंधित नहीं है।
गीता के सांकेतिक शब्दों को हिंदू धर्म के धर्मगुरु समझ नहीं पाए जिस कारण से शब्दों के अर्थों का अनर्थ किया है। उदाहरण के लिए गीता अध्याय 18 श्लोक 66 में "व्रज" शब्द है। उसका अर्थ है जाना, जाओ, चले जाना, दूर जाना। सर्व गीता अनुवादकों ने व्रज vraj का अर्थ "आना" किया है। अब प्रत्येक अनुवादक के किए अनुवाद में इस श्लोक को देखें। एस्कोन वालों ने तो कमाल कर रखा है। गीता अध्याय 18 के श्लोक 66 के शब्दार्थ पहले लिखे हैं, नीचे अनुवाद किया हैं शब्दार्थ में तो "व्रज" शब्द का अर्थ किया है "जाओ", परंतु अनुवाद में कर दिया "मेरी शरण में आओ।"
देखें गीता अध्याय 18 श्लोक 66 के शब्दार्थ तथा अनुवाद की फोटोकॉपी जो भक्ति वेदांत बुक ट्रस्ट, हरे कृष्ण धाम जूहू, मुंबई-400049 द्वारा प्रकाशित है तथा ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभु द्वारा अनुवादित है जिसका पूरा नाम इस प्रकार है कृष्ण कृपा मूर्ति श्री ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद। संस्थापकाचार्य :-अंतर्राष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ।
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: ।।६६।।
सर्व- धर्मान्=समस्त प्रकार के धर्म; परित्यज्य=त्यागकर; माम्=मेरी; एकम्=एकमात्र शरणम्=शरण में; व्रज= जाओ ; त्मवाम्= तुमको; सर्व= समस्त; पापेभ्वः= पापों से; मोक्षयिष्यामि=उध्दार करूँगा; मा=मत; शुचः=चिन्ता करो।
समस्त प्रकार के धर्मों का परित्याग करो और मेरी शरण में आओ। मैं समस्त पापों से तुम्हारा उध्दार कर दुँगा । डरो मत।
यह फोटोकॉफी गीता अध्याय 18 के श्लोक 66 की है। इसमें आप देख रहे हैं कि शब्दार्थ
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में "व्रज"=जाओ" किया है, नीचे अनुवाद में लिखा है कि मेरी शरण में आओ।
विचार करें :-अंग्रेजी भाषा के शब्द go का अर्थ जाना, जाओ है। इस शब्द का अर्थ आना, आओ करना मूर्खता के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। इसी प्रकार गीता प्रैस गोरखपुर से प्रकाशित सर्व गीता अनुवादकों जैसे श्री जयदयाल गोयन्दका, श्री रामसुखदास जी, महामंडलेश्वर गीता मनीषी जैसी उपाधि प्राप्त श्री ज्ञानानंद जी, अड़गड़ानंद जी ने तथा अन्य महा अनुभवों ने गीता के गूढ़ तथा सांकेतिक शब्दों के गूढ़ रहस्य को न समझकर अर्थ ने करके अनर्थ किए हैं, गलत अर्थ करके भोली जनता को भ्रमित किया है। इनके द्वारा किए गए गीता के अनुवाद वाली गीता पर The restriction (प्रतिबंध) लगाना चाहिए। जिन्होंने गलत अनुवाद किए हैं, उन सब की अनुवादित गीता से समाज में गीता की गरिमा को ठेस पहुंच रही है तथा गीता का यथार्थ संदेश massage जनता को नहीं मिल रहा।
जैसे गीता अध्याय 18 श्लोक 62 में भी गीता ज्ञान बोलने वाला अपने से अन्य परमेश्वर की शरण में जाने के लिए कह रहा है। उसी से संबंधित प्रकरण गीता अध्याय 18 श्लोक 66 में है जिसका अर्थ गलत करके गलत अनुवाद किया है। ऐसी -ऐसी अनेकों गलतियाॅं गीता के अनुवाद में मेरे अतिरिक्त सब के द्वारा की गई है
गीता के अनुवादक लिखते हैं कि श्री कृष्ण जी ने गीता का ज्ञान अर्जुन से कहा। श्री कृष्ण को विष्णु जी का अवतार यानी श्री विष्णु जी हि माता देवकी के गर्भ से उत्पन्न मानते हैं और श्री विष्णु जी उर्फ श्री कृष्ण श्री कृष्ण जी को अविनाशी कहते हैं। जबकि गीता का ज्ञान कहने वाला गीता अध्याय 2 श्लोक श्लोक 12, अध्याय 4 श्लोक 5, अध्याय 10 श्लोक 2, में अपने को नाशवान कहता है। कहा है कि हे अर्जुन! तेरे और मेरे अनेकों जन्म हो चुके हैं। कृपया देखें फोटोकॉपी गीता अध्याय 4 श्लोक 5 की जिसका अनुवाद भी हिंदू धर्म गुरुओं ने किया है।
बहूनि म् व्यतीतानी जन्मनि तव चार्जुन ।
तान्यहमं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ।।५।।
इसपर श्री भगवान् भोले__
परन्तप = हे परन्तप | मे = मेरे
अर्जुन = अर्जुन | च = और
तव = तेरे | त्वम् = तू
बहुनि = बहुत से | न = नहीं
जन्मानि = जन्म |
व्यतीतानि = हो चुके हैं। | वेत्थ = जानता, (किंतु)
तानि = उन | अहम् = मैं
सर्वाणि = सबको | वेद = जानता हूं।
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