गरिमा गीता की - दो शब्द page-13 ॥ अन् अधिकारीयों से यज्ञ व पाठ करवाना व्यर्थ हैं आइए जानते हैं?

 


Of dignity geeta/गरिमा गीता की - दो शब्द

Pege-13

 

          उसके लिए कहा है कि पूर्ण संत जो कबीर परमेश्वर (कविर्देव) का कृपा पात्र हो, उससे उपदेश लेकर अपना कल्याण करवाओ। झूठे गुरुओं के आश्रित रहने से जीवन व्यर्थ होता है। उस शास्त्र विरुद्ध साधना बताने वाले नकली गुरु को त्याग देना चाहियें। उसके तो दर्शन भी अशुभ होते हैं। आदरणीय गरीबदास की अपनी अमृतवाणी में कहते हैं कि:-

झूठे गुरु को लीतर लावैं, उसको निश्चय पीटे। उसके पीटे पाप नहीं है, घर से काढ़ घसीटे‌।।

उपरोक्त अमृतवाणी में आदरणीय गरीब दास साहेब जी शास्त्र विधि रहित साधना बताकर अनमोल मानव जन्म को नष्ट करने वाले नकली (झूठे) मार्ग दर्शकों (गुरुओं) के विषय में कह रहे हैं कि आप का जीवन नष्ट करने वाले हैं। उनसे तुरंत छुटकारा लेना चाहिये।घर में घुसने नहीं देना चाहिए। वे तो परमेश्वर कबीर (कविर्देव) के द्रोही है तथा काल के भेजे दूत हैं।

"अन् अधिकारी से यज्ञ पाठ करवाना व्यर्थ है"

          जिसको पूर्ण परमात्मा का मार्गदर्शन करने का अधिकार नहीं है तथा उसके पास सत्यभक्ती तीन मंत्र Three mantras की नहीं है, वह अन अधिकारी होता है। पूर्ण संत जो पूर्ण परमेश्वर की वास्तविक साधना बताता है उसे गुरु बनाकर उसी के माध्यम से सर्व धार्मिक अनुष्ठान करवाना हितकर है।

      कबीर गुरु बिन माला फेरते, गुरु बिन देते दान। गुरु बिन दोनों निष्फल हैं, पूछो वेद पुराण।।

        गुरु बिन यज्ञ हवन जो करही, निष्फल जाए कबहुं नहीं फलहीं।

            एक बार राजा परीक्षित King parikshit को सातवें दिन सर्प ने डसना था। उस समय सर्व ऋषियों ने यह निर्णय लिया कि राजा को 7 दिन तक श्रीमद् भागवत सुधा सागर का पाठ सुनाया जायें, ताकि राजा का मोह संसार से हट जाए। कौन ऐसा कथा करने वाला ऋषि है जिसके पाठ करने से राजा का कल्याण हो सके?

              विचार करें:-सातवें दिन का पता लग जाना था की कथा (पाठ) करने वाला अधिकारी है या नहीं। इसलिए पृथ्वी पर उपस्थित सर्व ऋषियों व महर्षियों ने पाठ (कथा) करने का कार्य स्वीकार नहीं किया। क्योंकि वे महापुरुष प्रभु के संविधान से परिचित थे, इसलिए राजा परिक्षित के जीवन से खिलवाड़ नहीं किया तथा जो ढोंगी थे वे इस डर से सामने नहीं आए कि सातवें दिन पोल खुल जायेगी। उस समय स्वर्ग से महर्षि सुखदेव जी बुलाए गए जो विमान में बैठकर आए। आते ही श्री सुखदेव जी ने राजा परीक्षित जी से कहा कि राजन आप मेरे से उपदेश प्राप्त करो अर्थात मुझे गुरु बनाओ तब कथा (पाठ) करने का फल प्राप्त होगा। राजा परीक्षित ने श्री सुखदेव जी को गुरु बनाया तब 7 दिन श्री भागवत सुधा सागर (श्री विष्णु और श्री कृष्ण जी की लीला) की कथा सुनाई। राजा को सर्प ने डसा। और राजा की मृत्यु हो गई। सूक्ष्म शरीर में राजा परीक्षत अपने गुरु श्री सुखदेव जी के साथ विमान में बैठकर स्वर्ग गए। क्योंकि पहले राजा बहुत धार्मिक होते थे, पुण्य करते रहते थे।

             राजा परीक्षित ने श्री कृष्ण जी से उपदेश भी प्राप्त था। उन्ही के मार्गदर्शन अनुसार बहुत धर्म किया था। परंतु बाद में कलयुग के प्रभाव से ऋषि भिंडी के गले में सर्प डालने से तथा अन्य मर्यादा हीन कार्य करने से राजा परीक्षित का उपदेश खंड हो गया था। उस समय न तो किसी ऋषि जी ने राजा को उपदेश देकर से बनाने की हिम्मत की, क्योंकि वे गुरु बनाने योग्य नहीं थे। उन्हें उपदेश देने का अधिकार नहीं था। केवल श्री कृष्ण जी ही उपदेश देते थे, जो पांडवों के भी गुरुजी थे तथा 56 करोड यादवों के भी गुरुजी थे गुरुजी थे। राजा परीक्षित के पुण्यों के आधार से श्री सुखदेव जी...page-13..... बनकर उसको कथा सुना कर संसार से आस्था हटवा कर केवल स्वर्ग ले गए। इतना लाभ राजा परीक्षित को हुआ। स्वर्ग का समय पूरा होने अर्थात पुण्य क्षीण होने के उपरांत राजा परीक्षित तथा सुखदेव जी भी नरक जाएंगे, फिर 8400000 लाख प्राणियों के शरीर में नाना कष्ट उठाएंगे। जन्म मृत्यु समाप्त नहीं हुआ अर्थात् मुक्त नहीं हुए।  

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