Of dignity geeta/गरिमा गीता की - दो शब्द
Pege-14
बनकर उसको कथा सुना कर संसार से आस्था हटवा कर केवल स्वर्ग ले गए। इतना लाभ राजा परीक्षित को हुआ। स्वर्ग का समय पूरा होने अर्थात पुण्य क्षीण होने के उपरांत राजा परीक्षित तथा सुखदेव जी भी नरक जाएंगे, फिर 8400000 लाख प्राणियों के शरीर में नाना कष्ट उठाएंगे। जन्म मृत्यु समाप्त नहीं हुआ अर्थात् मुक्त नहीं हुए।
गीता का जो ज्ञान वेदों (ऋग्वेद, अजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद) तथा सूक्ष्म वेद जो सच्चिदानंद घन ब्रह्म Sachchidanand Ghan Brahm अर्थात् सत्य पुरुष ने अपने मुख कमल से तत्वज्ञान बोला है, उससे मेल नहीं करता है तो वह गलत ज्ञान है। वह गीता ज्ञान दाता का अपना मत है, वह स्वीकार नहीं है। गीता ज्ञान दाता ने कई श्लोकों में (गीता अध्याय 13 श्लोक 2, अध्याय 7 श्लोक 18, अध्याय 6 श्लोक 36, अध्याय 3 श्लोक 31 तथा अध्याय 18 श्लोक 70 में) कहा है कि ऐसा मेरा मत है, मेरा विचार है। I'm think. श्रीमद भगवत गीता में 95% वेद ज्ञान है, 5% गीता ज्ञान दाता का अपना मत है। यदि वह वेदों से मेल खाता है तो ठीक है, अन्यथा व्यर्थ है। उदाहरण के लिए गीता अध्याय 2 श्लोक 37-38 पर्याप्त है। इनमें विरोधाभास है। गीता अध्याय 2 श्लोक से 37 में तो लाभ-हानि बता रहा है। कहा है कि या तो तू युद्ध में मरकर स्वर्ग को प्राप्त होगा अथवा युद्ध जीतकर पृथ्वी का राज भोगेगा। इसलिए हे अर्जुन! युद्ध के लिए खड़ा हो जा। (गीता अध्याय 2 श्लोक 37) फिर गीता अध्याय 2 श्लोक 38 में ही तुरंत इसके विपरीत का है कि जय-पराजय अर्थात् हार-जीत, सुख-दुख को समान समझकर युद्ध के लिए तैयार हो जा। इस प्रकार युद्ध करने से तू पाप को प्राप्त नहीं होगा। (गीता अध्याय 2 श्लोक 38)
गीता अध्याय 11 श्लोक 33 में भी स्पष्ट किया है कि "तू उठ, यश को प्राप्त कर। शत्रुओं को जीतकर धन्य-धन्य से संपन्न राज्य को भोग। मैंने तेरे सामने वाले योद्धाओं को पहले ही मार रखा है, तू केवल निमित्त मात्र बन जा।
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