Of dignity geeta/गरिमा गीता की - दो शब्द
Pege-3
गरिमा गीता की
दो शब्द
प्रमाण :- "गीता ज्ञान श्री कृष्ण ने नहीं कहा" :-
⚕️ जब कुरुक्षेत्र के मैदान में पवित्र गीता जी का ज्ञान सुनाते समय अध्याय 11 श्लोक 32 में पवित्र गीता बोलने वाला प्रभु कह रहा है की 'अर्जुन ने बढ़ा हुआ काल ( kal ) period हूॅं अब सर्व लोगों को खाने Eat के लिए प्रकट हुआ हूॅं जरा सोचो कि श्री कृष्ण जी तो पहले से ही श्री अर्जुन जी के साथ थे। यदि पवित्र गीता जी के ज्ञान को श्री कृष्ण जी बोल रहे होते तो यह नहीं कहते कि अब प्रवृत्त In force हुआ हूॅं। फिर अध्याय 11 श्लोक 21 व 46 में अर्जुन के रहा है कि भगवान् ! आप तो ऋषियों The sages, देवताओं The gods तथा सिद्धों Siddhas को भी खा रहे हो, जो आपका ही गुणगान पवित्र वेदों के मंत्रों द्वारा उच्चारण कर रहे हैं तथा अपने जीवन की रक्षा Defence के लिए मंगल कामना Wished कर रहे हैं। कुछ आप के दाढों में लटक रहे हैं, कुछ आपके मुख में समा रहे हैं। हे सहस्त्रबाहु Sahasrabahu अर्थात् हजारभुजा वाले भगवान! आप अपने उसी चतुर्भुज रूप में आइये। मैं आपके विकराल रूप Monotonous form को देखकर धीरज नहीं रख पा रहा हूॅं।
⚕️ गीता अध्याय 11 के श्लोक 31 में अर्जुन ने पूछा कि हे महानुभाव! उग्र रूप वाले आप कौन हैं? Who are you with a fiery appearance? मुझे बतलाइए।
⚕️ श्री कृष्ण जी तो अर्जुन के साले थे। श्री कृष्ण की बहन सुभद्रा का विवाह अर्जुन से हुआ था। क्या व्यक्ति अपने साले को भी नहीं जानता? है इससे सिद्ध है कि गीता का ज्ञान श्री कृष्ण ने नहीं कहा, काल ब्रह्म Kaal Brahm बोला था।
⚕️अध्याय 11 के श्लोक 47 में पवित्र गीता जी बोलने वाले प्रभु काल ने कहा कि 'हे अर्जुन! यह मेरा वास्तविक actual काल रूप है, जिसे तेरे अतिरिक्त पहले किसी ने नहीं देखा था ।'
⚕️ उपरोक्त विवरण से एक तथ्य तो यह सिद्ध हुआ कि कौरवों की सभा Assembly में विराट रूप से श्री कृष्ण जी ने दिखाया था तथा कुरुक्षेत्र में युद्ध के मैदान में विराट रूप काल (श्री कृष्ण जी के शरीर में प्रेतवत् Ghostly प्रवेश करके अपना विराट रूप काल) ने दिखाया था। नहीं तो यह नहीं कहता कि यह विराट रूप तेरे अतिरिक्त पहले किसी ने नहीं देखा है। क्योंकि श्री कृष्ण जी अपना विराट रूप कौरवों की सभा में पहले ही दिखा चुके थे जो अनेकों ने देखा था।
⚕️ दूसरी यह बात सिद्ध हुई कि पवित्र गीता जी को बोलने वाला काल (ब्रह्म- ज्योति निरंजन) है, न की श्री कृष्ण जी। क्योंकि श्री कृष्ण जी ने पहले कभी नहीं कहा कि मैं काल हूॅं तथा बाद में कभी नहीं कहा कि मैं काल हूॅं। श्री कृष्ण जी काल नहीं हो सकते। उनके दर्शन मात्र Mere sight को तो दूर-दूर क्षेत्र के स्त्री तथा पुरुष तडफा करते थे। पशु-पक्षी भी उनको प्यार करते थे। यही प्रमाण गीता अध्याय 7 श्लोक 24-25 में है जिसमें गीता ज्ञान दाता प्रभु ने कहा है कि बुद्धिहीन जन समुदाय मेरे उस घटिया (अनुत्तम) अटल विधान को नहीं जानते कि मैं कभी भी मनुष्य की तरह किसी के सामने प्रकट नहीं होता। मैं अपनी योगमाया से छिपा रहता हूॅं। I hide from my yoga maya
गीता अध्याय 4 के श्लोक 9 में कहा है कि हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य है। भावार्थ है कि काल ब्रह्म अन्य के शरीर में प्रवेश करके कार्य करता है जैसे श्री कृष्ण जी ने प्रतिज्ञा कर रखी थी कि मैं महाभारत के युद्ध में किसी को मारने के लिए शस्त्र भी नहीं उठाऊॅंगा। श्री कृष्ण में काल ब्रह्म ने प्रवेश होकर रथ का पहिया उठाकर अनेकों सैनिकों को मार डाला। पाप श्री कृष्ण जी के जिम्मे कर दिए। प्रतिज्ञा The pledge भी समाप्त करके कलंकित किया।
जिस समय काल भ्रमण श्री कृष्ण जी के शरीर से बाहर निकालकर अपना विराट रूप दिखाया, वह प्रकाशमान था। अर्जुन भयभीत हो गया तथा श्री कृष्ण उस विराट रूप के प्रकाश में ओझल हो गया था। इसीलिए पूछ रहा था कि आप कौन हो? क्या आपने साले से भी-
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यह पूछा जाता है कि आप कौन हो? इसलिए गीता का ज्ञान काल ब्रह्म ने श्री कृष्ण जी के शरीर में प्रवेश करके बोला था ।
>> उपरोक्त विवरण से सिद्ध हुआ कि गीता ज्ञान दाता श्री कृष्ण जी नहीं है क्योंकि श्री कृष्ण जी तो सर्व समक्ष साक्षात् थे, श्री कृष्ण नहीं कहते कि मैं अपनी योग माया से छुपा रहता हूॅं। इसीलिए गीता जी का ज्ञान श्री कृष्ण जी के अंदर प्रेतवत् प्रवेश करके काल ने बोला था।
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